Virat Kohli meet Premananda Maharaj : विराट कोहली टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने के अगले दिन मथुरा के वृंदावन पहुंचे। मंगलवार सुबह उन्होंने केली कुंज आश्रम में प्रेमानंद महाराज से आशीर्वाद लिया। पत्नी अनुष्का शर्मा भी साथ रहीं।
Virat Kohli और अनुष्का ने प्रेमानंद महाराज (Premananda Maharaj) से करीब 15 मिनट एकांतिक वार्तालाप की। दोनों केली कुंज आश्रम में 2 घंटे 20 मिनट रहे। सुबह 7.20 बजे इनोवा कार से पहुंचे। 9.40 बजे वहां से निकले। दोनों कार में मास्क लगाए बैठे थे। Virat Kohli news
दिग्गज क्रिकेट खिलाडी विरोटी कोहली अपनी पत्नी संग जिनसे मिलने आए प्रेमानंद महाराज कौन हैं। KANPUR का अखरी गांव, यहां प्रेमानंद का जिक्र होते ही लोग तपाक से कहते हैं- कौन अनिरुद्ध पांडेय? वो तो यही के रहने वाले हैं। यहीं पास में उनका घर है। ये सामने के शिव मंदिर में ही तो पूजा किया करते थे।
प्रेमानंद महाराज जिस गांव में 40 साल से नहीं लौटे, उस अखरी गांव का माहौल क्या है? प्रेमानंदजी के परिवार वाले कैसे हैं? दोस्त उनके बारे में क्या कहते हैं?
घर पर लिखा- श्रीगोविंद शरणजी महाराज जन्मस्थली हमारी टीम कानपुर मुख्यालय से 30 Km दूर सरसौल के अखरी गांव पहुंची। यहां दाखिल होते ही एक प्राइमरी स्कूल दिखा। इसके ठीक सामने से एक गली जा रही थी। इसमें करीब 50 मीटर चलने पर दो मंजिला घर दिखा। इसकी नेम-प्लेट पर श्रीगोविंद शरणजी महाराज वृंदावन जन्मस्थली लिखा था। यही वृंदावन के प्रेमानंद महाराज का घर है, जो उन्होंने 40 साल पहले छोड़कर संन्यास ले लिया। Virat Kohli news
यह कोई 1985 की बात रही होगी, जब वो 13 साल की उम्र में अचानक एक दिन सुबह 3 बजे घर छोड़ कर चले गए थे। इससे पहले उन्होंने गांव में ही शिव मंदिर की प्रतिष्ठा करवाई। हमने पूछा- फिर कभी गांव लौटकर आए क्या? उन्होंने कहा- नहीं, हम लोगों की पारिवारिक 5 बीघा खेती है, वह सब छोड़ गए। एक वक्त पर यहां झोपड़ीनुमा घर हुआ करता था। अब हम दो मंजिला पक्का मकान बड़ी मुश्किल से बना सके हैं।
भाई ने कहा- जिस डॉक्टर ने प्रेमानंद का इलाज किया, वो राधा भक्त थे गणेश दत्त ने कहा- हमने उनकी शिव भक्ति बचपन में देखी थी। घर छोड़ने के बाद वह एक दिन सरसौल के नंदेश्वर शिव मंदिर में रहे। यहां पर 14 घंटे भूखे-प्यासे बैठे रहे। फिर वह सैंमसी स्थित शिव मंदिर में 4 साल रहकर आराधना करते रहे।
उन्होंने बताया- वहां से वह काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी) चले गए। वहां उनका स्वास्थ्य खराब हुआ, तब संतों ने इन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। महाराज की दोनों किडनी खराब थीं। अस्पताल में मिले डॉक्टर राधा रानी के उपासक थे। डॉक्टर ने कहा- तुम वृंदावन चले जाओ, राधा रानी सब ठीक कर देंगी। स्वास्थ्य कुछ सही हुआ तो वह वृंदावन चले गए। यहां श्री हित गौरांगी शरण महाराज को उन्होंने गुरु माना। इसके बाद उन्होंने राधा रानी की उपासना शुरू की।
अब अनिरुद्ध कुमार पांडेय के प्रेमानंद महाराज बनने का सफर…
9वीं में दाखिले के 4 महीने बाद ही स्कूल छोड़ा गांव वालों ने बताया- अखरी गांव में प्रेमानंद के पिता शंभू नारायण पांडेय पुरोहित का काम करते थे। अनिरुद्ध भी बचपन से ही आध्यात्मिक थे। बचपन में पूरा परिवार रोजाना एक साथ बैठकर पूजा-पाठ करता था। अनिरुद्ध यह सब बड़े ध्यान से देखा-सुना करते थे। आज जिन प्रेमानंद महाराज के भक्तों में आम आदमी से लेकर सेलिब्रिटी तक शुमार हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई सिर्फ 8वीं कक्षा तक हुई है। 9वीं में भास्करानंद विद्यालय में एडमिशन दिलाया गया। लेकिन, 4 महीने में ही उन्होंने स्कूल छोड़ दिया।
शिव मंदिर में चबूतरा बनाने से रोका, तो घर छोड़ दिया एक कहानी ऐसी है, बचपन में अनिरुद्ध ने अपनी सखा टोली के साथ शिव मंदिर के लिए एक चबूतरा बनाना चाहा। इसका निर्माण भी शुरू करवाया, लेकिन कुछ लोगों ने उन्हें रोक दिया। इससे वह मायूस हो गए। उनका मन इस कदर टूटा कि घर छोड़ने का फैसला कर लिया। देर रात खाना खाया और रोज की तरह छत पर बने कच्चे कमरे में जाकर सो गए।
अगली सुबह जब बड़े भाई ने जगाने के लिए आवाज लगाई, तो कमरे से कोई जवाब नहीं आया। उन्होंने ऊपर जाकर देखा तो अनिरुद्ध कमरे में नहीं थे। खोजबीन शुरू की गई। काफी मशक्कत के बाद पता चला कि वो सरसौल में नंदेश्वर मंदिर पर रुके हैं।
घरवालों ने उन्हें घर लाने का हर जतन किया, लेकिन अनिरुद्ध नहीं माने। फिर कुछ दिनों बाद बची-खुची मोह-माया छोड़कर वह सरसौल से भी चले गए।
प्रेमानंदजी महाराज अपने प्रवचन में बताते हैं- जब मैं 5वीं में पढ़ रहा था, तभी से गीता का पाठ शुरू कर दिया। इस तरह से धीरे-धीरे मेरी रुचि अध्यात्म की ओर बढ़ने लगी। Premananda Maharaj
जब 13 साल का हुआ, तो ब्रह्मचारी बनने का फैसला किया। इसके बाद घर का त्याग कर संन्यासी बन गया। शुरुआत में प्रेमानंद महाराज का नाम ‘आरयन ब्रह्मचारी’ रखा गया।
भोजन की इच्छा से 15 मिनट बैठते, नहीं मिलने पर गंगाजल के सहारे रहते काशी में प्रेमानंद महाराज ने करीब 15 महीने बिताए। उन्होंने गौरी शरण जी महाराज से गुरुदीक्षा ली। वाराणसी में संन्यासी जीवन के दौरान वो रोज गंगा में तीन बार स्नान करते।
तुलसी घाट पर भगवान शिव और माता गंगा का ध्यान-पूजन करते। दिन में केवल एक बार भोजन करते। प्रेमानंद महाराज भिक्षा मांगने की जगह भोजन प्राप्ति की इच्छा से 10-15 मिनट बैठते थे।
अगर इतने समय में भोजन मिला तो उसे ग्रहण करते, नहीं तो सिर्फ गंगाजल पीकर रह जाते। संन्यासी जीवन की दिनचर्या में प्रेमानंद महाराज ने कई दिन बिना कुछ खाए-पीए बिताया।
बाद वृंदावन आने की कहानी बेहद रोचक
अब प्रेमानंद के वृंदावन पहुंचने की कहानी Premananda Maharaj के संन्यासी बनने के बाद वृंदावन आने की कहानी बेहद रोचक है। एक दिन प्रेमानंद महाराज से मिलने एक संत आए। उन्होंने कहा- श्री हनुमत धाम विश्वविद्यालय में श्रीराम शर्मा दिन में श्री चैतन्य लीला और रात में रासलीला मंच का आयोजन कर रहे हैं। इसमें आप आमंत्रित हैं।
पहले तो प्रेमानंद महाराज ने अपरिचित साधु से वहां आने के लिए मना कर दिया। लेकिन, साधु ने उनसे आयोजन में शामिल होने के लिए काफी आग्रह किया। इस पर प्रेमानंद महाराज ने आमंत्रण स्वीकार कर लिया।
प्रेमानंद महाराज जब चैतन्य लीला और रासलीला देखने गए, तो उन्हें बहुत पसंद आई। यह आयोजन करीब एक महीने तक चला। चैतन्य लीला और रासलीला समाप्त होने के बाद प्रेमानंद महाराज को आयोजन देखने की व्याकुलता होने लगी। वह उसी साधु के पास गए, जो उन्हें आमंत्रित करने आए थे।
उनसे मिलकर महाराज ने कहा- मुझे भी अपने साथ ले चलें। मैं रासलीला देखूंगा और इसके बदले आपकी सेवा करूंगा। इस पर साधु ने कहा- आप वृंदावन आ जाएं। वहां हर रोज आपको रासलीला देखने को मिलेगी। इसके बाद प्रेमानंद महाराज वृंदावन आ गए।
वृंदावन आने के बाद महाराज ने खुद को राधा-श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। यहां खुद को राधा-रानी और श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। साथ ही भगवद प्राप्ति में लग गए। इसके बाद महाराज संन्यास मार्ग से भक्ति मार्ग में आ गए।
संन्यासी से राधावल्लभी संत बन गए प्रेमानंद महाराज प्रेमानंद महाराज वृंदावन पहुंचकर हर रोज बांके बिहारी का दर्शन करते। फिर रासलीला रास आई और राधावल्लभ के कार्यक्रमों में जाने लगे। वहां घंटों खड़े रहते।
एक दिन एक संत ने श्री राधारससुधानिधि से एक श्लोक पढ़ा, लेकिन महाराज उसे समझ नहीं पाए। फिर एक दिन वृंदावन की परिक्रमा करते समय एक सखी को एक श्लोक गाते हुए सुना। उसे सुनकर महाराज ठिठक गए।
श्लोक ऐसा रास आया कि अपना संन्यास धर्म तोड़कर वो उस सखी के पास गए। उससे श्लोक का मतलब पूछा। सखी ने कहा- इसका मतलब समझने के लिए राधावल्लभी होना जरूरी है। इस तरह महाराज राधावल्लभी हो गए।
यह संप्रदाय रस की उपासना के लिए जाना जाता है। इस रस की उपासना में कृष्ण की लीलाओं जैसे निकुंज लीला, वन विहार लीला और रासलीला का अनोखे ढंग से वर्णन किया जाता है।
SOURCE : DAINIK BHASKAR

