KANPUR NEWS : महाराजपुर थाना क्षेत्र में वर्ष 1991 में हुई फर्जी पुलिस मुठभेड़ के मामले में 35 साल बाद 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है।
CBCID की जांच में मुठभेड़ की कहानी पर सवाल उठने और डीसीएम चालक व क्लीनर के बयानों के आधार पर पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ महाराजपुर थाने में आठ धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। मामले की आगे की विवेचना सीबीसीआईडी करेगी। पुलिस के अनुसार, इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई है।
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क्या था मामला
22 अगस्त 1991 को पुलिस को सूचना मिली थी कि बदमाश नरवल मोड़ स्थित जीटी रोड पर वाहनों को रोककर लूटपाट करने की योजना बना रहे हैं। पुलिस ने दावा किया था कि 23 अगस्त की रात करीब 12:30 बजे बदमाशों ने सड़क पर बबूल की डालियां डालकर ट्रक और डीसीएम रोकने का प्रयास किया। इसके बाद पुलिस से मुठभेड़ हुई, जिसमें राकेश पाठक समेत 12 लोगों को गिरफ्तार करने और उनके पास से अवैध असलहे व बम बरामद होने की बात कही गई थी।
इस मामले में महाराजपुर थाने में मुकदमा अपराध संख्या 399/91 के तहत आईपीसी की धारा 402 और 307 में मुकदमा दर्ज किया गया था। इसके अलावा शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक अधिनियम के तहत भी मुकदमे दर्ज किए गए थे। विवेचना के बाद आरोपपत्र कोर्ट में दाखिल किए गए, लेकिन साक्ष्य के अभाव में वर्ष 1995 में आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया गया था।
डीसीएम चालक और क्लीनर के बयान से पलटा मामला
सीआईडी जांच में डीसीएम चालक उमाशंकर पासी और क्लीनर विजेंद्र सिंह के बयान ने पुलिस की झूठी मुठभेड़ की पोल खोल दी। दोनों ने बताया कि 22 अगस्त 1991 को वे साबुन लादकर डीसीएम से कानपुर से बनारस जा रहे थे। रामादेवी चौराहे पर पुलिसकर्मियों ने कुछ लोगों को उनकी गाड़ी में बैठाया। इसके बाद डीसीएम को महाराजपुर थाने ले गए। चालक और क्लीनर ने बताया कि नरवल मोड़ पर बदमाशों के डीसीएम रोकने या पुलिस से मुठभेड़ होने जैसी कोई घटना नहीं हुई। दोनों ने बताया कि पुलिस ने पकड़े गए लोगों से मारपीट की और अन्य लोगों को भी अलग-अलग स्थानों से पकड़कर थाने ले आए। इसके बाद असलहे और बम बरामद होने की कहानी तैयार की गई। दोनों ने बताया कि अगले दिन उनसे लिखे हुए कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए, लेकिन उसमें लिखा क्या है यह नहीं बताया गया।
घर से उठा ले गई थी पुलिस
मामले में आरोपित बनाये गये सफीपुर निवासी सुरेन्द्र कुमार द्विवेदी उर्फ राजा भैया के भाई वीरेन्द्र ने बताया कि उनके भाई को पुलिस रात में जबरन घर से उठा ले गई थी। परिवार को पता तक नहीं था कि पुलिस ने भाई को क्यों उठाया। पुलिस ने उन्हें निर्दाष होने के बाद भी जबरन मामले में फंसाया। उन्होंने बताया कि फर्जी उनके भाई को इस मामले में फंसाया गया। इससे पूरा परिवार काफी परेशान था। अब सच की जीत हुई है। हालांकि अब 35 साल बाद भाई को न्याय मिलने की उम्मीद जग गई।
1992 में दी गई थी शिकायत
मामले में वर्ष 1992 में राकेश पाठक के भाई देव प्रसाद पाठक निवासी चकेरी ने प्रार्थनापत्र देकर शिकायत की थी। इसके बाद से मामले की जांच चल रही थी। देव प्रसाद पाठक लगातार इस लड़ाई को लड़ते रहे। अब उन्हें 35 साल बाद न्याय मिला। हालांकि देव प्रसाद पाठक अब अपने गांधीग्राम निवास पर नहीं रहते हैं। वे अब जूही के आनंदपुरी में रहने लगे हैं।
इन पुलिसकर्मियों पर दर्ज हुआ मुकदमा

आगरा के एत्माद्दौला निवासी सब इंस्पेक्टर बीडी सारस्वत, कौशांबी के चरवा मसोई निवासी सब इंस्पेक्टर योगेंद्र नाथ सिंह, भदोही के सीतामढ़ी निवासी हेड कांस्टेबल नारायण तिवारी, फतेहपुर के कल्याणपुर निवासी कांस्टेबल तेज नारायण सिंह, कौशांबी निवासी कांस्टेबल बैद्यनाथ, जौनपुर के बदलापुर निवासी कांस्टेबल बृजेश कुमार, कौशांबी निवासी कांस्टेबल चन्द्रबली, प्रयागराज यमुना नगर निवासी विद्याकांत शुक्ला, कौशांबी निवासी कांस्टेबल राम आसरे, प्रयागराज के गंगानगर निवासी रमेश कुमार तिवारी, गंगानगर सोरांव निवासी कांस्टेबल ड्राइवर जागेश्वर प्रसाद और चकेरी के केडीए कॉलोनी निवासी दारोगा (विवेचक) रमेश चंद्र पर मुकदमा दर्ज हुआ।
छह पुलिस कर्मियों की हो चुकी है मौत
इस मामले में दोषी 18 पुलिसकर्मियो में से छह की मौत हो चुकी है। मृतकों में श्याम नगर निवासी विद्या सागर त्रिपाठी, प्रयागराज के थाना धूमनगंज के कालिन्दीपुरम निवासी उप निरीक्षक रमाकांत, मैनपुरी के ग्राम बियूती निवासी उप निरीक्षक दुर्बीन सिंह, बलिया के ग्राम रामगत का डेरा कांस्टेबल राजन सिंह, प्रयागराज के ग्राम खुरमा निवासी कांस्टेबल उदय शंकर पांडेय और गाजीपुर के ग्राम बीरपुर निवासी कांस्टेबल महेन्द्र सिंह हैं। जिनकी मौत होने के बाद सीबीसीआईडी ने इन्हे आरोपों से अलग कर दिया।

