Supreme Court : देश के 12 राज्य/केंद्रशासित राज्यों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण चल रहा है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राज्य मतदाता सूचियों को संशोधित करने के लिए बूथ स्तर के अधिकारियों या बीएलओ के रूप में काम करने वाले पुरुषों और महिलाओं की मृत्यु पर गंभीर चिंता व्यक्त की। बता दें कि कई बीएलओ ने काम के दबाव में आत्महत्या भी कर ली है। Supreme Court
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देशभर में चल रहे वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर कई राज्यों में बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) ने काम के प्रेशर की शिकायत की है. पश्चिम बंगाल में बीएलओ अधिकारियों ने इसे लेकर प्रदर्शन भी किए हैं और यूपी के मुरादाबाद में एक बीएलओ अधिकारी के सुसाइड का मामला भी सामने आया है. बीएलओ ने सुसाइड नोट में भी इस बात का जिक्र किया कि उन पर काम का प्रेशर है.
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कोर्ट ने कहा कि SIR चुनाव से जुड़ा आवश्यक काम है. सरकारी कर्मचारियों को इसे करना ही होगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राज्य सरकार ने लगभग एक लाख 30 हजार कर्मचारी दिए हैं, तो और 30-40 हजार कर्मचारी उपलब्ध करवाने में क्या समस्या है. कोर्ट ने काम में कोताही बरतने वाले BLO पर FIR दर्ज करने को कहा है. कोर्ट ने कहा कि ऐसा पहले भी होता रहा है. इस तरह की प्रक्रिया को एक समय सीमा में पूरा करना जरूरी है.
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम की याचिका के बाद दिया है। टीवीके ने देश के कई राज्यों में कई बीएलओ की मौत के विवाद के बीच कोर्ट का रुख किया था। टीवके ने चुनाव आयोग पर प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 32 के तहत जेल भेजने की धमकी देकर बीएलओ को काम करने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया था।
टीवीके ने दिया था ये तर्क
विजय की पार्टी टीवीके का तर्क है कि प्रत्येक राज्य में ऐसे परिवार हैं जिनके बच्चे अनाथ हो गए हैं या माता-पिता अलग हो गए हैं क्योंकि चुनाव आयोग धारा 32 के तहत नोटिस भेज रहा है। टीवीके का दावा है कि अकेले उत्तर प्रदेश में ही बीएलओ के खिलाफ 50 से ज्यादा पुलिस मामले दर्ज किए गए हैं,फिलहाल चुनाव आयोग से बस यही अनुरोध है कि वह ऐसी कठोर कार्रवाई न करे।
हालांकि, न्यायालय ने बीएलओ की मौतों के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराने की मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा कि बीएलओ राज्य सरकार के कर्मचारी हैं।
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