Central Government Said: राष्ट्रपति और राज्यपाल को विधानसभा से पास हुए बिलों पर फैसला करने की समयसीमा तय करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केंद्र सरकार का कहना है कि इस तरह समय तय करना संविधान के खिलाफ होगा और इससे संवैधानिक अव्यवस्था पैदा हो सकती है। Central Government Said
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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) को लिखित जवाब में कहा है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल पर समय सीमा थोपना न्यायपालिका द्वारा अपने अधिकार से आगे बढ़ने जैसा है। इससे सरकार की अलग-अलग शाखाओं (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) के बीच संतुलन बिगड़ जाएगा।
सॉलिसिटर जनरल का तर्क
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को भी आर्टिकल 142 के तहत मिले विशेष अधिकारों से संविधान में बदलाव करने की इजाजत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ दिक्कतें जरूर हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि राज्यपाल जैसे उच्च पद को निचले स्तर पर दिखाया जाए।
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मेहता के मुताबिक, राष्ट्रपति और राज्यपाल लोकतांत्रिक शासन की ऊंची अवधारणाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर कहीं गलती होती है तो उसे राजनीतिक और संवैधानिक तरीकों से ठीक किया जाना चाहिए न कि अदालत के दखल से।
संविधान में क्या लिखा है?
संविधान के आर्टिकल 200 के अनुसार, राज्यपाल के पास बिल पर चार विकल्प होते हैं…
1. बिल को मंजूरी देना।
2. मंजूरी रोकना।
3. बिल को दोबारा विचार के लिए विधानसभा को लौटाना। (लेकिन अगर विधानसभा दोबारा पास कर देती है तो राज्यपाल को मंजूरी देनी ही होगी)
4. बिल को राष्ट्रपति के पास भेजना, अगर वह संविधान या राष्ट्रीय महत्व से जुड़ा मामला है तो।
अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया में समयसीमा तय करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रपति को तीन महीने और राज्यपाल को एक महीने के भीतर बिल पर फैसला करना होगा।
‘सुप्रीम कोर्ट संविधान को संशोधित नहीं कर सकता’
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में यह लिखित जवाब शीर्ष अदालत के जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की बेंच की ओर से विधायिक से पारित किसी बिल की मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के वास्ते तीन महीने और गवर्नरों के लिए एक महीने की डेडलाइन निर्धारित करने के आदेश के खिलाफ दायर किया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपने जवाब में कहा है, ‘आर्टिकल 142 के तहत निहित अपनी असाधारण शक्तियों के तहत भी सुप्रीम कोर्ट संविधान को संशोधित या संविधान निर्माताओं की मंशा को नाकाम नहीं कर सकता….’
‘अनुचित न्यायिक’दखल के खिलाफ दिए तर्क
मेहता की ओर से कहा गया है कि हो सकता है कि मंजूरी की प्रक्रिया को ‘तामील करने में कुछ सीमित समस्याएं हों’, लेकिन इससे ‘गवर्नर के उच्च पद को कमतर बना देने’को न्यायचित नहीं ठहराया जा सकता। उनका तर्क है कि गवर्नर और राष्ट्रपति के पद ‘राजनीतिक रूप से पूर्ण’ हैं और ‘लोकतांत्रिक शासन के उच्च आदर्शों’ की नुमाइंदगी करते हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा को जो भी कथित खामियां हैं, उन्हें राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्थाओं के तहत ही ठीक किया जाना चाहिए, न कि ‘अनुचित न्यायिक’दखल के माध्यम से।
बिल पर मंजूरी के लिए गवर्नर के पास शक्तियां
संविधान के अनुच्छेद 200 के अनुसार गवर्नर विधानसभा से पारित किसी बिल पर हस्ताक्षर कर सकता है, इसे राष्ट्रपति के विचार के लिए रोक सकता है या रिजर्व रख सकता है। इसके अलावा राज्यपाल ऐसे बिल को विधानसभा के पास पुनर्विचार के लिए भी लौटा सकता है। लेकिन, अगर विधानसभा ने उसे फिर से पारित कर दिया, तब राज्यपाल को उसे मंजूरी देनी ही होगी। राज्यपाल का यह विशेषाधिकार है कि अगर उसे लगता है कि उसके सामने लाया गया कोई बिल संविधान के अनुसार, नीति निदेशक तत्वों या राष्ट्रीय महत्त्व का नहीं है, तो वह इसे राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है।
राष्ट्रपति ने 14 सवाल पूछकर मांगी है राय
12 अप्रैल को तमिलनाडु की डीएमके सरकार से जुड़े एक मामले में अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए इस तरह की मंजूरी की समय-सीमा तय करने वाला आदेश जारी किया था। इसपर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस तरह की डेडलाइन तय किए जाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की संवैधानिकता को लेकर उससे 14 सवाल पूछे थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आर्टिकल 200 और 201 के तहत राज्य विधानसभा से पारित विधेयकों को लेकर राष्ट्रपति और गवर्नरों की शक्तियों पर राय देने को कहा था।
सुप्रीम कोर्ट में 19 अगस्त से होगी सुनवाई
राष्ट्रपति की ओर से उठाए गए प्रश्नों पर विचार के लिए भारत के चीफ जस्टिस (CJI) बीआर गवई ने अपनी अगुवाई में पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ गठित की है। इसमें उनके अलावा जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चांदूरकर शामिल हैं। इस बेंच ने केंद्र और राज्य सरकारों से 12 अगस्त तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा था। इस केस की सुनवाई 19 अगस्त से होनी है।

