Govardhan Parvat: हिंदू धर्म ग्रंथों में ऐसी कई पौराणिक कथाएं मिलती हैं, जो व्यक्ति को हैरत में डालने के साथ-साथ कुछ-न-कुछ शिक्षा भी देती हैं। मथुरा में स्थित गोवर्धन पर्वत को लेकर भी कई पौराणिक कथाएं मिलती हैं। Govardhan Parvat
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कहा जाता है कि जब इंद्र देव ने क्रोध में आकर ब्रज में घनघोर वर्षा की थी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया था। इससे ब्रजवासियों की मूसलाधार बारिश से रक्षा हुई। साथ ही गोवर्धन पर्वत को लेकर यह भी कहा जाता है कि यह पर्वत रोजाना तिल बराबर घटता है। चलिए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा।
पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ऋषि पुलस्त्य गिरिराज पर्वत के पास से गुजर रहे थे। तभी गोवर्धन पर्वत की सुंदरता ने उनका मन मोह लिया। तब उनके मन में यह इच्छा जागी कि क्यों न वह इस पर्वत को काशी में स्थापित कर लें और और वहीं रहकर इसकी पूजा-अर्चना करें। इसके लिए उन्होंने द्रोणाचल पर्वत से निवेदन किया कि वह अपने पुत्र गोवर्धन को उन्हें सौंप दें।
द्रोणाचल पर्वत अपने पुत्र गोवर्धन के लिए दुखी हो रहे थे, लेकिन गोवर्धन पर्वत ने ऋषि से कहा कि मैं आपके साथ चलुंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। आप मुझे जहां रख देंगे, मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगा। पुलस्त्यजी ने गोवर्धन की यह बात मान ली। गोवर्धन ने ऋषि से कहा कि मैं दो योजन ऊंचा और पांच योजन चौड़ा हूं। आप मुझे काशी कैसे ले जाएंगे?
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पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि मैं अपने तपोबल से तुम्हें अपनी हथेली पर उठाकर ले जाऊंगा। तब गोवर्धन पर्वत ऋषि के साथ चलने के लिए सहमत हो गए। रास्ते में ब्रज भूमि आई। उसे देखकर गोवर्धन सोचने लगा कि भगवान श्रीकृष्ण यहां बाल्यकाल और किशोरकाल की बहुत सी लीलाएं करेंगे। अगर मैं यहीं रह जाऊं तो उनकी लीलाओं को देख सकूंगा। ये सोचकर गोवर्धन पर्वत पुलस्त्य ऋषि के हाथों में और अधिक भारी हो गया।
ऋषि को विश्राम करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसके बाद ऋषि ने गोवर्धन पर्वत को ब्रज में रखकर विश्राम करने लगे। ऋषि ये बात भूल गए थे कि उन्हें गोवर्धन पर्वत को कहीं रखना नहीं है। कुछ देर बाद ऋषि पर्वत को वापस उठाने लगे लेकिन गोवर्धन ने कहा कि ऋषिवर अब मैं यहां से कहीं नहीं जा सकता। मैंने आपसे पहले ही आग्रह किया था कि आप मुझे जहां रख देंगे, मैं वहीं स्थापित हो जाउंगा। तब पुलस्त्यजी उसे ले जाने की हठ करने लगे, लेकिन गोवर्धन वहां से नहीं हिला। तब ऋषि ने उसे श्राप दिया कि तुमने मेरे मनोरथ को पूर्ण नहीं होने दिया, अत: आज से प्रतिदिन तिल-तिल कर तुम्हारा क्षरण होता जाएगा। फिर एक दिन तुम धरती में समाहित हो जाओगे। तभी से गोवर्धन पर्वत तिल-तिल करके धरती में समा रहा है। कलियुग के अंत तक यह धरती में पूरा समा जाएगा।
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भगवान श्रीकृष्ण ने इसी पर्वत को इन्द्र का मान मर्दन करने के लिए अपनी सबसे छोटी उंगली पर तीन दिनों तक उठा कर रखा था और सभी वृंदावन वासियों की रक्षा इंद्र के कोप से की थी।
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