Uttar Pradesh News : गोंडा-देवीपाटन मंडल की कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल (Commissioner Durga Shakti Nagpal ) ने सिविल जज शबीना खान (Civil Judge Shabina Khan) को फोन करने से जुड़े विवाद पर अपना पक्ष रखा है। कमिश्नर ने मंगलवार सूचना विभाग के माध्यम से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पूरे मामले पर अपना पक्ष रखा।
उन्होंने मंगलवार को कहा- उनका इरादा सिर्फ सरकारी जमीन से जुड़े पुराने पेंडिंग केस की ठीक से पैरवी कराना था। उन्होंने कोई दबाव नहीं बनाया। बातचीत के दौरान न तो केस के फैसले या मेरिट पर चर्चा हुई और न ही किसी खास केस के नाम या नंबर का जिक्र किया गया।
उन्होंने लिखा है कि Commissioner न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी गरिमा का पूरा सम्मान करती हैं। उनका उद्देश्य केवल करीब 30 साल से लंबित सरकारी जमीन के मामले की स्थिति जानना और सरकार के हितों की प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था। पूरे मामले को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना नहीं था, बल्कि करीब तीन दशक से लंबित सरकारी नजूल जमीन से जुड़े मामले में प्रशासनिक स्थिति की जानकारी लेना और सरकार के पक्ष की प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था।
क्या हुआ विवाद
दरअसल, गोंडा जिले में सीनियर डिवीजन की सिविल जज शबीना खान ने 4 अगस्त को IAS अफसर के खिलाफ जिला जज को लेटर लिखकर कहा था कि कमिश्नर अपने पद का दुरुपयोग कर रही हैं। उन्होंने मुझ पर अनुचित दबाव बनाया, हाईकोर्ट में शिकायत करने की धमकी दी और मेरे संस्कारों पर सवाल उठाए। इससे मैं आहत हूं।
जज ने लेटर में महिला IAS अफसर से आई कॉल का पूरा ब्योरा दिया। अनुरोध किया कि संबंधित केस को किसी अन्य अदालत में ट्रांसफर कर दिया जाए। इसके बाद मुकदमा गोंडा के सीनियर डिवीजन सिविल जज एफटीसी नवीन की कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया।
इस मामले का इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) की लखनऊ बेंच ने भी संज्ञान लिया। सोमवार को कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड आदेश में बेंच ने कहा कि आईएएस अफसर का जज को फोन करके दबाव बनाने की कोशिश करना न्यायपालिका की आजादी पर सीधा हमला है। इस हरकत पर आपराधिक अवमानना का केस चलना चाहिए।
कमिश्नर की सफाई में इस विवाद का एक दूसरा बड़ा पहलू सामने आया है। उनके मुताबिक, जिस मामले को लेकर फोन किए जाने की बात सामने आई है, वह 1997 से लंबित है और अत्यंत मूल्यवान सरकारी नजूल भूमि से जुड़ा हुआ है। इस जमीन पर एक निजी विद्यालय संचालित हो रहा है।
पढ़िए कमिश्नर ने क्या सफाई दी
कमिश्नर के मुताबिक, यह मामला करीब 30 साल से लंबित है और सरकारी नजूल भूमि से जुड़ा है। रिकॉर्ड के मुताबिक, यह जमीन सरकारी है और 1985 में इसका पट्टा रद्द कर जमीन सरकार के नाम दर्ज कर दी गई थी। इसके बावजूद 2008 से एक साधारण कागज के आधार पर इस जमीन का पट्टा दिखाया जा रहा है। इस जमीन पर एक निजी स्कूल भी चल रहा है।
मंडलायुक्त को पदभार संभालने के बाद जब इस पुराने मामले की जानकारी हुई, तो उनका उद्देश्य सरकारी जमीन को सुरक्षित रखना और मामले में सरकार की ओर से सही तरीके से पैरवी सुनिश्चित करना था।
इसी दौरान उन्हें यह जानकारी नहीं मिल पाई कि संबंधित पीठासीन अधिकारी छुट्टी से कब लौटेंगी। इसलिए मंडलायुक्त ने उन्हें सिर्फ यह पूछने के लिए फोन किया कि वह कब वापस आएंगी। फोन पर मामले के सही-गलत होने, किसी आदेश या फैसले को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई। वाद संख्या या मामले का नाम लेकर भी कोई बात नहीं की गई।
27 साल की सेवा का जिक्र गलत
कमिश्नर के मुताबिक, पीठासीन अधिकारी के पत्र में भी ऐसी किसी बातचीत का उल्लेख नहीं है। पत्र में मंडलायुक्त की 27 साल की सेवा का जिक्र भी सही नहीं है। उनकी सेवा करीब 16 साल की है। यह भी उल्लेखनीय है कि मंडलायुक्त से बात करने के लिए संदेश दिए जाने के बाद पीठासीन अधिकारी ने खुद उन्हें फोन किया था।

