Lord Nataraj Story: नटराज की प्रतिमा के पैरों के नीचे एक दानव भी दबा रहता है? किन्तु क्या आपने ध्यान दिया है कि कौन है ये दानव और भगवान शिव के नटराज स्वरूप के पैरों के नीचे इसके दबे होने की कथा क्या है? Lord Nataraj Story
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क्या आप इसके बारे में जानते हैं. आपके मन में अक्सर यह सवाल आता होगा. आज इस लेख में हम इस रहस्य से पर्दा उठाने जा रहे हैं.
लोगों को दुख पहुंचाता था दैत्य अपस्मार
स्कंद पुराण के मुताबिक, एक बार की बात है, जब अपस्मार नाम का बौना राक्षस हुआ करता था. वह स्वयं को सर्वशक्तिशाली और दूसरों को हीन समझता था. उसे अमर होने और अपनी अपनी शक्तियों से किसी की भी चेतना का हरण करने का वरदान प्राप्त था. उसे लापरवाही एवं मिर्गी के रोग का प्रतिनिधि भी माना गया है. TRENDING NOW
अपनी इसी शक्ति के बल पर अपस्मार सभी को दुःख पहुंचाता रहता था. उस के प्रभाव की वजह से लोग मिर्गी के रोग से ग्रसित होकर अनेक कष्ट भोगते थे. अपनी इस शक्ति एवं अमरता के कारण उसे अभिमान हो गया कि उसे कोई परास्त नहीं कर सकता. Who is demon buried under feet of Lord Nataraj
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बौने राक्षस अपस्मार की कैसे हुई उत्पत्ति
एक बार अनेक ऋषि अपनी-अपनी पत्नियों के साथ हवन एवं साधना कर रहे थे. प्रभु की माया से उन्हें अपने त्याग और सिद्धियों पर अभिमान हो गया और उन्हें लगा कि संसार केवल उन्ही की सिद्धियों पर टिका है. तभी भगवान शंकर और माता पार्वती भिक्षुक के वेश में वहां पधारे. जिससे सभी स्त्रियां उन्हें प्रणाम करने के लिए यज्ञ छोड़ कर उठ गई.
इससे उन ऋषियों को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी सिद्धि से कई विषधर सर्पों को उत्पन्न कर भिक्षुक रुपी महादेव पर आक्रमण करने को कहा किन्तु भगवान शंकर ने सभी सर्पों का दलन कर दिया. तब उन ऋषियों ने वहीं उपस्थित अपस्मार को उन पर आक्रमण करने को कहा.
पैरों के नीचे दबाकर नृत्य करने लगे महादेव
अपस्मार ने दोनों पर आक्रमण किया और अपनी शक्ति से माता पार्वती को भ्रमित कर उनकी चेतना लुप्त कर दी. जिससे माता अचेत हो गयी. ये देख कर भगवान शंकर अत्यंत क्रुद्ध हुए और उन्होंने 14 बार अपने डमरू का नाद किया. उस भीषण नाद को अपस्मार सहन नहीं कर पाया और भूमि पर गिर पड़ा.
इसके बाद भगवान शिव ने अलौकिक नटराज का रूप धारण किया और अपस्मार को अपने पैरों के नीचे दबा कर नृत्य करने लगे. नटराज रूप में भगवान शंकर ने एक पैर से उसे दबा कर और एक पैर उठाकर अपस्मार की सभी शक्तियों का दलन कर दिया. ऐसा करते हुए वे स्वयं संतुलित होकर स्थिर हो गए. उनकी यही मुद्रा “अंजलि मुद्रा” कहलाई.
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और टूट गया साधुओं का अहंकार
उन्होंने उस राक्षस का वध इसीलिए नहीं किया क्योंकि एक तो वो अमर था और दूसरे उसके मरने पर संसार से उपेक्षा का लोप हो जाता. जिससे किसी भी विद्या को प्राप्त करना अत्यंत सरल हो जाता. इससे विद्यार्थियों में विद्या को प्राप्त करने के प्रति सम्मान समाप्त हो जाता.
“माहेश्वर सूत्र” की रचना…
जब उन साधुओं ने भगवान शंकर का वो रूप देखा तो उनका अभिमान समाप्त हो गया और वे बारम्बार उनकी स्तुति करने लगे. उन्होंने उसी प्रकार अपस्मार को निष्क्रिय रखने की प्रार्थना की ताकि भविष्य में संसार में कोई उसकी शक्तियों के प्रभाव में ना आए. नटराज रूप में महादेव ने जो 14 बार अपने डमरू का नाद किया था, उसे ही आधार मान कर महर्षि पाणिनि ने 14 सूत्रों वाले रूद्राष्टाध्यायी “माहेश्वर सूत्र” की रचना की.
दुनिया को क्या शिक्षा देते हैं नटराज
तो इस प्रकार अपस्मार को अपने पैरों के नीचे दबाये अभय मुद्रा में भगवान शंकर का नटराज स्वरुप ये शिक्षा देता है कि यदि हम चाहें तो अपने किसी भी दोष को स्वयं संतुलित कर उसका दलन कर सकते हैं. महादेव का नटराज स्वरुप पाप के दलन का प्रतीक तो है ही किन्तु उसके साथ-साथ आत्मसंयम एवं इच्छाशक्ति का भी प्रतीक है.
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