Dharmendra Pradhan News : साल 1997. Odisha में Congress की सरकार थी. मुख्यमंत्री थे जानकी वल्लभ पटनायक. शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी भगबत प्रसाद मोहंती पर थी.
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, प्रह्लाद जोशी को चार्ज
राज्य में पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन चल रहा था. आंदोलन का नेतृत्व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) कर रही थी. आंदोलन पर पुलिस की लाठियां बरसीं. तमाम छात्र नेताओं के साथ ABVP के राष्ट्रीय महासचिव भी घायल हुए. नाम था Dharmendra Pradhan.
कट टू 2026. तारीख 25 जुलाई. Paper leak को लेकर चल रहे प्रदर्शन में Union Education Minister का इस्तीफा हुआ. ये वही शख्स हैं, जिन्होंने साल 1997 में ओडिशा में पेपर लीक के खिलाफ लाठियां खाई थीं. इस बार वो लाइन के उस पार थे. उनके इस्तीफे की मांग कर रहे छात्र-छात्राओं पर भी पुलिस की लाठियां बरसी हैं. संयोग से तब भी महीना जुलाई का ही था और अब भी.
भगबत प्रसाद मोहंती के खिलाफ आंदोलन
भगबत प्रसाद मोहंती की राजनीति की शुरुआत प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से हुई थी. ओडिशा में वे PSP के कद्दावर नेता के तौर पर गिने जाते थे. 1980 के दशक में मोहंती ने कांग्रेस का दामन थाम लिया. 1980 से 1990 के दशक के बीच वे दो बार विधायक रहे. विधायक के तौर पर दूसरे कार्यकाल में उनको शिक्षा मंत्री बनाया गया. उनके शिक्षा मंत्री रहते साल 1997 में ओडिशा बोर्ड की 12वीं (प्लस 2) की परीक्षाओं के पेपर लीक होने के आरोप लगे.
इसके खिलाफ ABVP ने प्रोटेस्ट शुरू कर दिया. भुवनेश्वर के यूनिट-5 स्थित राज्य सचिवालय के बाहर लगभग 1,500 लोग जमा हुए. इस भीड़ में एक नौजवान भी था, जो कथित पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा था. राज्य के मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री से इस्तीफे की मांग कर रहा था. इस्तीफा मांग रहे नौजवान का नाम Dharmendra Pradhan था. तब वे ABVP के राष्ट्रीय सचिव थे. भुवनेश्वर के पटिया इलाके में स्थित राजा मधुसूदन देव कॉलेज के अध्यक्ष प्रशांत राउत ने बीबीसी को बताया,
उन दिनों मैं ABVP के भुवनेश्वर ब्रांच का अध्यक्ष था और धर्मेंद्र प्रधान संगठन के राष्ट्रीय महासचिव. मुझे तारीख ठीक से याद नहीं. लेकिन जुलाई 1997 के तीसरे सप्ताह के किसी दिन (शायद 17 या 18 तारीख) रही होगी. ABVP के सैंकड़ों कार्यकर्ता धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे.
पिटाई में Dharmendra Pradhan की हड्डियां टूटी
प्रशांत राउत ने बताया कि तब 1988 से 1997 के बीच लगभग हर साल पेपर लीक हो रहे थे. इसलिए वे लोग उसे ‘डिकेड ऑफ क्वेश्चन’ लीक कहा करते थे. उन्होंने आगे बताया,
विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ. लेकिन पुलिस की लाठीचार्ज के बाद हिंसक हो गया. प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों ने हम लोगों पर डंडे बरसाए. इसमें हमारे 64 कार्यकर्ता घायल हुए, उनको अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.
NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने दूसरे प्रदर्शनकारियों समेत धर्मेंद्र प्रधान की भी बेरहमी से पिटाई की, उनकी कई हड्डियां टूट गईं. चोट के बावजूद प्रधान आंदोलन में डटे रहे. बाद में उनको अस्पताल में भर्ती कराया गया.
30 साल बाद हालात बदल गए
लगभग 30 साल बाद स्थितियां बदल गईं. तब व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा नौजवान अब व्यवस्था का हिस्सा था. और उनके खिलाफ फिर से खड़े थे छात्र और नौजवान. लगभग 30 साल में किरदारों की कहानी भले बदल गई. लेकिन मुद्दा नहीं बदला. इस बार भी आंदोलन पेपर लीक के खिलाफ ही था. तब ओडिसा के शिक्षा मंत्री अपनी कुर्सी बचा गए थे. लेकिन इस बार धर्मेंद्र प्रधान अपनी कुर्सी नहीं बचा पाए. उनको इस्तीफा देना पड़ा.
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