Lucknow News : 38 साल पहले भूमाफिया ने चकबंदी विभाग का फर्जी आदेश बनवाया। इसका इस्तेमाल कर उसने छह गांवों की 120 बीघा सरकारी जमीन पर कब्जा किया और उसका बड़ा हिस्सा बेच भी दिया।
इन जमीनों की कीमत 2,000 करोड़ रुपये मानी जा रही है। महकमे के अफसर और कर्मचारी भूमाफिया के दावे को सही मानते हुए उसके पक्ष में आदेश करते रहे। इस जानकारी पर चकबंदी आयुक्त डॉक्टर ऋषिकेश भास्कर यशोध ने डीएम विशाख जी (DM Vishakh G) से जांच रिपोर्ट मांगी थी जिसमें फ़र्जी वाड़े का खुलासा हुआ है।
डॉ. ऋषिकेश भास्कर यशोद, चकबंदी आयुक्त ने बताय कि लखनऊ के डीएम को जांच पूरी करने के लिए निर्देश दिया था। उसी क्रम में अब जांच पूरी होकर आई है। प्रथम दृष्टया दोषी अधिकारियों पर निश्चित रूप से कार्रवाई होगी। राजस्व के नुकसान का आकलन कर जरूरी होगा तो उसकी वसूली भी की जाएगी।
भूमिका की भी पड़ताल की जाएगी
इस बीच, भूमाफिया इन जमीनों को खतौनी में दर्ज करवाने के लिए साल 2020 में हाई कोर्ट पहुंच गया। वहां दस्तावेज का सत्यापन किया गया तो मामला खुल गया। अब चकबंदी विभाग ने 7 अफसरों के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश की है।
इसके साथ ही 1988 से लेकर अब तक इस मामले से जुड़े सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल की जाएगी। इस मामले में सोमवार को रामेंद्र कुमार, अमित कुमार, सुनील कुमार और लईक खां के खिलाफ जानकीपुरम थाने में एफआईआर दर्ज करवाई गई है। ये सभी जमीन कब्जाने के खेल में शामिल बताए जा रहे हैं।
कोर्ट में फर्जी आदेश का किया प्रयोग
भूमाफिया सिकंदर खान ने साल 2020 में हाईकोर्ट में अपील कर कुछ जमीनों को खतौनी में दर्ज किए जाने में हीलाहवाली की शिकायत की। जमीन पर दावों के पक्ष में उसने 1988 के फर्जी आदेश का प्रयोग किया। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट को शक हुआ तो तत्कालीन डीएम लखनऊ से उस आदेश को सत्यापित करने का हलफनामा मांगा। इस पर डीएम ने 2021 में पांच सदस्यीय जांच कमिटी बना दी। इसके बाद मामला ठंडा हो गया।
चकबंदी आयुक्त को 5 अगस्त को सौंपी गई रिपोर्ट
कोर्ट में सुनवाई के दौरान स्टैंडिंग काउंसिल डॉ. कृष्णा सिंह ने 23 जुलाई 2026 को चकबंदी विभाग से जांच कमेटी की रिपोर्ट के बारे में पूछा। जांच में देरी होने के संबंध में लिखित रूप से रेवेन्यू बोर्ड के चेयरमैन, चीफ सेक्रेटरी और प्रिंसिपल सेक्रेटरी (न्याय) को भी सूचित किया। इसके बाद 5 अगस्त 2026 को रिपोर्ट चकबंदी आयुक्त को सौंपी गई। रिपोर्ट के मुताबिक सिकंदर और उसके साथी इस खेल के कर्ता-धर्ता है।
बिना सुनवाई कोर्ट का फर्जी आदेश
भूमाफिया सिकंदर खान ने पहले से कब्जा की गई कुछ जमीनें 1988 में खतौनी में चढ़वाने की कोशिश की, पर दस्तावेज सही न होने के कारण वह चकबंदी अधिकारी और बदोबस्त अधिकारी चकबंदी के कोर्ट में केस हार गया। इसके बाद उसने उपसंचालक चकबंदी कोर्ट (दोनों से ऊपरी) का फर्जी आदेश तैयार करवा लिया।
जानिए कैसे खुला पूरा मामला
इस फर्जी आदेश से जुड़े दस्तावेज भी चकबंदी कार्यालय के रेकॉर्ड रूम में ‘प्लांट’ करवाए गए, ताकि जांच में फर्जीवाड़ा पकड़ में न आए। लेकिन कोर्ट की सुनवाई की तारीखें मिजिलबंद रजिस्टर में नहीं दर्ज थी। इस रजिस्टर में कोर्ट केस की सारी तारीखें दर्ज होती हैं। ऐसे में सवाल उठा कि जब सुनवाई की तारीख ही नहीं लगी तो फैसला कैसे आ गया? इससे सारा मामला खुल गया।
कहां-कहां हुआ जमीनों का खेल
देवा रोड, बीकेटी, इंदिरानगर और जानकीपुरम में चरागाह और बंजर समेत सरकारी जमीनों की खरीद-फरोख्त की गई। इनमें से कई जमीनें प्राइम लोकेशन पर हैं। कुछ पर तो पक्के निर्माण भी हो चुके हैं।

